मशहूर लेखक असगर वजाहत का हिंदी में एक नाटक है, जिन लाहौर नहीं देख्या, वो जन्मया ही नहीं। करीब पंद्रह साल पहले प्रसिद्ध नाट्यकर्मी हबीब तनवीर ने इस नाटक का दिल्ली में मंचन किया था, तब मैंने इसे देखा था। भारत विभाजन की त्रासदी पर आधारित इस नाटक का प्लॉट तो अब याद नहीं रहा, लेकिन कच्छ पर कुछ लिखने की बारी आई, तो उस नाटक का मुखड़ा जरूर याद आ गया। जी हां, कच्छ भी मेरे लिए कुछ वैसा ही है, जैसा उन लोगों के लिए लाहौर, जो विभाजन के छह दशक बाद भी लाहौर को अपने दिल में समेटे हुए हैं।
कच्छ से मेरा रिश्ता अब दशक भर पुराना हो गया है। १९९९ में गुजरात आया, तब से लगातार कच्छ जाता रहा हूं। कभी दो दिन के लिए, तो कभी पखवाड़े भर के लिए जाना हुआ कच्छ में। कच्छ मेरे लिए दूसरे घर जैसा रहा है। अहमदाबाद के बाद अगर किसी इलाके में सबसे ज्यादा रहा हूं, तो वो कच्छ ही है। कच्छ के सुख-दुख, हर पल का साथी बने रहने का मौका मिला है मुझे। २६ जनवरी २००१ के भयावह भूकंप के अगले दिन ही भुज पहुंचा था, उसके बाद से अमूमन हर हफ्ते कच्छ जाता रहा अगले चार महीने तक। उसके बाद फ्रिक्वेंसी कम होती चली गई, लेकिन कच्छ के साथ संबंधों की गरमाहट नहीं।
दरअसल कच्छ मेरे लिए स्टोरी एसाइनमेंट से ज्यादा उन लोगों, उन जगहों, उन संगठनों के पास जाने के प्लेटफॉर्म के तौर पर ज्यादा रहा है, जिन्हें मैं दिल से पसंद करता हूं। कच्छ मित्र, श्री कीर्ति खत्री, श्री निखिल पंडया, माइक वाघेला, मांडवी, कोटेश्वर, खावड़ा, विगोकोट, प्वाइंट ११७५, नलिया ऐसे ही चंद नाम हैं। माइक का कच्छ सफारी लॉज तो पिछले पांच साल से भुज में मेरा स्थाई ठिकाना जैसा ही है, जब भी भुज आता हूं अमूमन यही रुकना होता है। कई बार तो लगता है कि रूद्रमाता डैम के करीब बने इस सुंदर से रिसॉर्ट पर रूकने के लिए ही मैं कच्छ आते रहता हूं।
कच्छ हर बार कुछ नया सीखाता है मुझे। मुझे याद है एक बार कच्छ मित्र के संपादक और गुजरात में पत्रकारिता के अत्यंत प्रतिष्ठित नामों में से एक श्री कीर्ति खत्री के साथ सोडा राजपूतों के एक गांव में जाना हुआ। वहां दोपहरी में अपने घर के अंदर बैठे एक आदमी को एक पुरानी सी किताब पढ़ते देखा। दरअसल वो सिंधी के एक मशहूर कवि की सिंधी में लिखी हुई कविता को ही तन्मयता से पढ़ने में लगा हुआ था। १९७१ के भारत-पाक युद्ध के बाद बड़े पैमाने पर सोडा राजपूत कच्छ में शरणार्थी के तौर पर आकर बस गये थे, लेकिन चार दशक बाद भी सिंध की संस्कृति और भाषा से उनका प्रेम अटूत बना हुआ था।
वैसे तो कच्छ के अनगिनत किस्से एक के बाद एक याद आने लगते हैं, लेकिन एक किस्सा खास तौर पर दिमाग में बना हुआ है। एक बार कीर्तिभाई से बात हो रही थी, गांधीनगर आ रहे थे वो। पूछा किस संदर्भ में, पता चला कि कच्छ के लिए नर्मदा का पानी ज्यादा मात्रा में मिले, इसके लिए सरकार में रजुआत करने जा रहे हैं। जानकर अच्छा लगा, अब भी ऐसे अखबार और संपादक रह गये हैं, जिनके लिए अखबार या फिर पत्रकारिता सिर्फ धंधा या प्रोडक्ट नहीं, बल्कि एक मिशन भी है उन लोगों के भले के लिए, जिनका प्रतिनिधित्व वो करते हैं, जिन्हें वो जुबान देते हैं।
बधाई कच्छ, बधाई कच्छ मित्र।
कच्छ से मेरा रिश्ता अब दशक भर पुराना हो गया है। १९९९ में गुजरात आया, तब से लगातार कच्छ जाता रहा हूं। कभी दो दिन के लिए, तो कभी पखवाड़े भर के लिए जाना हुआ कच्छ में। कच्छ मेरे लिए दूसरे घर जैसा रहा है। अहमदाबाद के बाद अगर किसी इलाके में सबसे ज्यादा रहा हूं, तो वो कच्छ ही है। कच्छ के सुख-दुख, हर पल का साथी बने रहने का मौका मिला है मुझे। २६ जनवरी २००१ के भयावह भूकंप के अगले दिन ही भुज पहुंचा था, उसके बाद से अमूमन हर हफ्ते कच्छ जाता रहा अगले चार महीने तक। उसके बाद फ्रिक्वेंसी कम होती चली गई, लेकिन कच्छ के साथ संबंधों की गरमाहट नहीं।
दरअसल कच्छ मेरे लिए स्टोरी एसाइनमेंट से ज्यादा उन लोगों, उन जगहों, उन संगठनों के पास जाने के प्लेटफॉर्म के तौर पर ज्यादा रहा है, जिन्हें मैं दिल से पसंद करता हूं। कच्छ मित्र, श्री कीर्ति खत्री, श्री निखिल पंडया, माइक वाघेला, मांडवी, कोटेश्वर, खावड़ा, विगोकोट, प्वाइंट ११७५, नलिया ऐसे ही चंद नाम हैं। माइक का कच्छ सफारी लॉज तो पिछले पांच साल से भुज में मेरा स्थाई ठिकाना जैसा ही है, जब भी भुज आता हूं अमूमन यही रुकना होता है। कई बार तो लगता है कि रूद्रमाता डैम के करीब बने इस सुंदर से रिसॉर्ट पर रूकने के लिए ही मैं कच्छ आते रहता हूं।
कच्छ हर बार कुछ नया सीखाता है मुझे। मुझे याद है एक बार कच्छ मित्र के संपादक और गुजरात में पत्रकारिता के अत्यंत प्रतिष्ठित नामों में से एक श्री कीर्ति खत्री के साथ सोडा राजपूतों के एक गांव में जाना हुआ। वहां दोपहरी में अपने घर के अंदर बैठे एक आदमी को एक पुरानी सी किताब पढ़ते देखा। दरअसल वो सिंधी के एक मशहूर कवि की सिंधी में लिखी हुई कविता को ही तन्मयता से पढ़ने में लगा हुआ था। १९७१ के भारत-पाक युद्ध के बाद बड़े पैमाने पर सोडा राजपूत कच्छ में शरणार्थी के तौर पर आकर बस गये थे, लेकिन चार दशक बाद भी सिंध की संस्कृति और भाषा से उनका प्रेम अटूत बना हुआ था।
वैसे तो कच्छ के अनगिनत किस्से एक के बाद एक याद आने लगते हैं, लेकिन एक किस्सा खास तौर पर दिमाग में बना हुआ है। एक बार कीर्तिभाई से बात हो रही थी, गांधीनगर आ रहे थे वो। पूछा किस संदर्भ में, पता चला कि कच्छ के लिए नर्मदा का पानी ज्यादा मात्रा में मिले, इसके लिए सरकार में रजुआत करने जा रहे हैं। जानकर अच्छा लगा, अब भी ऐसे अखबार और संपादक रह गये हैं, जिनके लिए अखबार या फिर पत्रकारिता सिर्फ धंधा या प्रोडक्ट नहीं, बल्कि एक मिशन भी है उन लोगों के भले के लिए, जिनका प्रतिनिधित्व वो करते हैं, जिन्हें वो जुबान देते हैं।
बधाई कच्छ, बधाई कच्छ मित्र।