Tuesday, July 23, 2013

जूनागढ़, आरजी हुकूमत आंदोलन और रंजीतसिंहजी गोहिल

एबीपी न्यूज़ पर 'प्रधानमंत्री' नाम से एक कार्यक्रम शुरु हुआ है। 1947 बाद की प्रमुख घटनाओं पर आधारित ये कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम का दूसरा एपिसोड इसी शनिवार और रविवार को दिखाया गया, जिसका एक हिस्सा जूनागढ़ के भारत में शामिल होने वाले घटनाक्रम को लेकर था। इतिहास में स्वाभाविक रुचि होने और वो भी मसला जूनागढ़ का होने के कारण उस दौर के बारे में जिज्ञासा और बढ़ी। कुछ और उपलब्ध किताबों को पढ़ना शुरु किया। इस दौरान ध्यान में आया कि जूनागढ़ के नवाब ने जब अपनी रियासत का विलय 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान में कर दिया, तो उसे लेकर न सिर्फ जूनागढ़ की जनता में बड़े पैमाने पर आक्रोश पैदा हुआ, बल्कि आसपास के इलाके के लोग भी इससे हतप्रभ रह गये। आरजी हुकूमत नाम से एक जन आंदोलन शुरु हुआ और जूनागढ़ रियासत के अंदर आने वाले गांवो और प्रमुख कस्बों पर एक के बाद स्वतंत्रता सेनानियों ने न सिर्फ अहिंसक, बल्कि जरुरत पड़ने पर हिंसक संघर्ष के जरिये भी कब्जा करना शुरु किया। परिणाम ये हुआ कि नवाब 24 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान भाग गया, दीवान शाहनवाज भुट्टो को बदली हुई परिस्थितियों में नवाब की सहमति से आठ नवंबर, 1947 को जूनागढ़ का कब्जा लेने के लिए भारत सरकार को अनुरोध करना पड़ा और इस अनुरोध के हिसाब से नौ नवंबर, 1947 को भारत सरकार ने अपने प्रतिनिधि नीलम बुच के जरिये जूनागढ़ का प्रशासन अपने हाथ में लिया और शांति बहाली की प्रक्रिया शुरु की। बाद में जनमत संग्रह के बाद जूनागढ़ के भारत में विलय की अंतिम औपचारिकता भी पूरी की गई।
ये इतिहास का वो हिस्सा है, जो जूनागढ़ में रुचि रखने वाले लोगों को अमूमन पता है। लेकिन इसके कुछ और पहलू हैं, जिसके बारे में या तो ज्यादा लिखा नहीं गया है या फिर ये लोगों के ध्यान में कम ही आता है। मसलन आज के भावनगर जिले में हनुभा का लिमड़ा नामक जो स्थान है, वो आजादी के पहले एक छोटी सी रियासत हुआ करती थी। उस लिमड़ा के तत्कालीन शासक रंजीतसिंहजी गोहिल जूनागढ़ के स्वतंत्रता संघर्ष के प्रमुख कमांडरों में से एक रहे। अपनी सेना के साथ वो आरजी हुकूमत से जुड़े नेताओं और स्वयंसेवकों के साथ जूनागढ़ के इलाकों में घुसे और एक बड़े हिस्से पर कब्जा करने में सक्रिय भूमिका निभाई। जब देश की छोटी-मोटी तमाम रियासतों का विलय शुरु हुआ, तो रंजीतसिंहजी ने प्रीवीपर्स या नकद मुआवजा लेने की जगह खेती के लिेए ज्यादा जमीन लेना पसंद किया। बाद में रंजीतसिंहजी गोहिल सक्रिय चुनावी राजनीति में भी आए और 1967 में स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की और गुजरात की तीसरी विधानसभा के सदस्य बने। रंजीतसिंहजी पढ़ने के भी शौकीन थे और उनकी अपनी समृद्ध लाइब्रेरी भी हुआ करती थी। उनका एक दूसरा परिचय मौजूदा पीढ़ी के लिए ये भी है कि वो गुजरात में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शक्तिसिंह गोहिल के दादा थे। रंजीतसिंहजी के बारे में थोड़ा सा उल्लेख जूनागढ़ के जिला गजेटियर में या फिर आरजी हुकूमत को लेकर लिखी गई एसवी जानी की किताब में मिलता है। इंटरनेट पर भी रंजीतसिंहजी गोहिल के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। आरजी हुकूमत के नेताओं में से सनत मेहता जैसे प्रमुख लोग ही अब याद आते हैं। बेहतर होगा, अगर आरजी हुकूमत आंदोलन के दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया को और गहराई में उतरकर आगे बढ़ाया जाए। उस आंदोलन से जुड़ी पीढ़ी के लोग अब कम ही बचे हैं, ऐसे में अगर ये प्रयास जल्दी हो तो ज्यादा बेहतर।