Tuesday, March 17, 2009

पंडित जी

यशवंत सिंह के ब्लॉग पर इंदौर की चर्चा देखी, तो पंडित जी की याद आ गई। पंडित जी यानी आशीष जोशी, जो फिलहाल आजतक में हैं। आशीष उम्र में मेरे से बड़े हैं, लेकिन शुरूआत से ही संबोधन उल्टा रहा, इसलिए आशीष जोशी को मैं आशीष कहता रहा और वो मुझे बड़े भाई। आशीष को पंडित कहना कब शुरू किया, याद नहीं। लेकिन आदत ऐसी पड़ गई कि अब आशीष के लिए पंडित के अलावा कोई शब्द निकलता ही नहीं। पंडित ने काफी समय बिताया है अपना इंदौर में। और बात जब भी इंदौर की आए, तो फिर पंडित की जुबान पर मालवा, दाल बाफले और रतलाम की नमकीन और पता नहीं क्या-क्या। हर दूसरे दिन रतलामी सेवों की दुकान खोलने की योजना तो बन ही जाती थी, खास तौर पर तब जब पत्रकारिता से मन उबता हुआ दिखे या फिर नौकरी खतरे में दिखे। पता नहीं, कभी पंडित की दुकान खुल भी जाए। भगवान न करे मजबूरी में, बल्कि बुढ़ापे के शौक के तौर पर, हालांकि बुढ़ापा अभी खासा दूर है पंडित का।
पंडित से पहली मुलाकात ज़ी में हुई थी, नया-नया आईआईएमसी से आया था पंडित। हालांकि पंडित ये बताना कभी नहीं भूला कि आईआईएमसी तो बस एक बहाना था दिल्ली में पांव रखने का, पत्रकारिता वो भी गंभीर किस्म की, काफी पहले शुरू कर दी थी उसने। पंडित के जरिये ही मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ कि मध्य प्रदेश में पत्रकारों के जलवे क्या हैं और किस-किस तरह के गुल खिलाते हैं पत्रकार।
पंडित के बारे में फुर्सत से लिखूंगा, बताने के लिए बहुत कुछ है और।

पत्रकार दुनिया का विचार

कोशिश करने जा रहा हूं वो सब लिखने की, जो एक दशक से भी अधिक की पत्रकारिता के दौरान अनुभव किया। डायरी लिखने की आदत रही नहीं, इसलिए कोशिश होगी कि अपने दिमाग के हार्ड डिस्क को हिलाया जाए और जो कुछ सहज तौर पर याद आ जाए, उसे इस ब्लॉग पर रखा जाए। हालांकि ये सब कुछ सिलसिलेवार हो ये जरूरी नहीं। जो लिखने में ज्यादा मजा आएगा, उसे लिखूंगा, बाकी को कल पर छोड़ दूंगा। परिचय के तौर पर इतना ही बताना चाहूंगा कि बिहार के पश्चिमी हिस्से के एक गांव से शुरूआती पढ़ाई करने के बाद दिल्ली तक पहुंचा और फिर आईआईएमसी के सहारे पत्रकारिता की दुनिया में। पिछले तेरह सालों की पत्रकारिता के दौरान देश के कई राज्यों में जाना हुआ, धरातल पर क्या चल रहा है, इसका अनुभव किया और आखिरकार दिल्ली की परिधि से बाहर भी निकल गया। इसका एक फायदा भी हुआ। दिल्लीवासी पत्रकारों में सहज तौर पर पाये जाने वाले मायोपिया के उस दोष से बच गया, जिसके तहत ये मान लिया जाता है कि पत्रकारिता में पांडित्य दिल्ली में बैठकर ही दिखाया जा सकता है, चाहे अखबार में या फिर न्यूज़ चैनलों में। ब्लॉग को पत्रकार दुनिया का नाम इसलिए दिया, ताकि भविष्य में अगर आदत बरकरार रही, तो पत्रकारिता की दुनिया में चल रही हलचलों पर अपने सहज विचार रख सकूं।