कोशिश करने जा रहा हूं वो सब लिखने की, जो एक दशक से भी अधिक की पत्रकारिता के दौरान अनुभव किया। डायरी लिखने की आदत रही नहीं, इसलिए कोशिश होगी कि अपने दिमाग के हार्ड डिस्क को हिलाया जाए और जो कुछ सहज तौर पर याद आ जाए, उसे इस ब्लॉग पर रखा जाए। हालांकि ये सब कुछ सिलसिलेवार हो ये जरूरी नहीं। जो लिखने में ज्यादा मजा आएगा, उसे लिखूंगा, बाकी को कल पर छोड़ दूंगा। परिचय के तौर पर इतना ही बताना चाहूंगा कि बिहार के पश्चिमी हिस्से के एक गांव से शुरूआती पढ़ाई करने के बाद दिल्ली तक पहुंचा और फिर आईआईएमसी के सहारे पत्रकारिता की दुनिया में। पिछले तेरह सालों की पत्रकारिता के दौरान देश के कई राज्यों में जाना हुआ, धरातल पर क्या चल रहा है, इसका अनुभव किया और आखिरकार दिल्ली की परिधि से बाहर भी निकल गया। इसका एक फायदा भी हुआ। दिल्लीवासी पत्रकारों में सहज तौर पर पाये जाने वाले मायोपिया के उस दोष से बच गया, जिसके तहत ये मान लिया जाता है कि पत्रकारिता में पांडित्य दिल्ली में बैठकर ही दिखाया जा सकता है, चाहे अखबार में या फिर न्यूज़ चैनलों में। ब्लॉग को पत्रकार दुनिया का नाम इसलिए दिया, ताकि भविष्य में अगर आदत बरकरार रही, तो पत्रकारिता की दुनिया में चल रही हलचलों पर अपने सहज विचार रख सकूं।
Tuesday, March 17, 2009
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Shi kha apne..sbko yhi lagta hai ki journalissirf delhi me hi sikha ja akta h..apka decision admirable hai..kuch naya krke apko achchha lga..
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