यशवंत सिंह के ब्लॉग पर इंदौर की चर्चा देखी, तो पंडित जी की याद आ गई। पंडित जी यानी आशीष जोशी, जो फिलहाल आजतक में हैं। आशीष उम्र में मेरे से बड़े हैं, लेकिन शुरूआत से ही संबोधन उल्टा रहा, इसलिए आशीष जोशी को मैं आशीष कहता रहा और वो मुझे बड़े भाई। आशीष को पंडित कहना कब शुरू किया, याद नहीं। लेकिन आदत ऐसी पड़ गई कि अब आशीष के लिए पंडित के अलावा कोई शब्द निकलता ही नहीं। पंडित ने काफी समय बिताया है अपना इंदौर में। और बात जब भी इंदौर की आए, तो फिर पंडित की जुबान पर मालवा, दाल बाफले और रतलाम की नमकीन और पता नहीं क्या-क्या। हर दूसरे दिन रतलामी सेवों की दुकान खोलने की योजना तो बन ही जाती थी, खास तौर पर तब जब पत्रकारिता से मन उबता हुआ दिखे या फिर नौकरी खतरे में दिखे। पता नहीं, कभी पंडित की दुकान खुल भी जाए। भगवान न करे मजबूरी में, बल्कि बुढ़ापे के शौक के तौर पर, हालांकि बुढ़ापा अभी खासा दूर है पंडित का।
पंडित से पहली मुलाकात ज़ी में हुई थी, नया-नया आईआईएमसी से आया था पंडित। हालांकि पंडित ये बताना कभी नहीं भूला कि आईआईएमसी तो बस एक बहाना था दिल्ली में पांव रखने का, पत्रकारिता वो भी गंभीर किस्म की, काफी पहले शुरू कर दी थी उसने। पंडित के जरिये ही मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ कि मध्य प्रदेश में पत्रकारों के जलवे क्या हैं और किस-किस तरह के गुल खिलाते हैं पत्रकार।
पंडित के बारे में फुर्सत से लिखूंगा, बताने के लिए बहुत कुछ है और।
Tuesday, March 17, 2009
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